अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने एक 14 साल के लड़के के साथ दुष्कर्म के मामले में एक नाबालिग आरोपी को 20 साल की कड़ी सजा सुनाई है। अदालत का यह फैसला बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों और नाबालिग अपराधियों पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। अदालत ने आरोपी को पहले ऑब्जर्वेशन होम में रखने और पीड़ित को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।
अदालत का फैसला और कानून का आधार
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, विशेष न्यायाधीश एम.पी. पुरोहित ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के तहत सोडोमी (समान लिंग के व्यक्ति से दुष्कर्म) के लिए अधिकतम सजा 10 साल है, जबकि पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की धारा 4 के तहत 20 साल तक की सजा दी जा सकती है। इसी आधार पर अदालत ने 20 साल की कैद की सजा सुनाई। अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि आरोपी को 21 साल की उम्र पूरी होने तक ऑब्जर्वेशन होम में रखा जाएगा, जिसके बाद उसे जेल में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
कैसे सामने आया मामला?
यह मामला जनवरी 2024 में घोखरा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) के माध्यम से सामने आया। शिकायत में बताया गया था कि आरोपी (उस समय 17 साल) ने 14 साल के पीड़ित लड़के के साथ दुष्कर्म किया और इस घटना को अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया। इसके बाद आरोपी ने वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देकर पीड़ित से 10,000 रुपये भी वसूले।
नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा
इस अपराध की गंभीरता को देखते हुए, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के मुख्य न्यायाधीश ने अप्रैल 2024 में इस मामले को बच्चों की विशेष अदालत में भेज दिया। यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि कानून के तहत गंभीर अपराधों में नाबालिगों पर भी वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति दी जा सकती है। पब्लिक प्रोसिक्यूटर जी.पी. दवे और अजय त्रिवेदी ने ट्रायल के दौरान 14 गवाहों को पेश किया और 30 दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए ताकि आरोपी की दोषसिद्धि को साबित किया जा सके। अदालत ने आरोपी को अपहरण, सोडोमी, आपराधिक धमकी सहित आईपीसी की विभिन्न धाराओं और पोक्सो एक्ट व सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत दोषी ठहराया।
बचाव पक्ष की दलील खारिज
बचाव पक्ष ने आरोपी के पक्ष में यह दलील दी कि उसने महसाणा रिमांड होम में अपनी पढ़ाई पूरी की है और इस साल कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षा भी पास की है। लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया और सजा को बरकरार रखा, यह दर्शाते हुए कि अपराध की गंभीरता किसी भी शैक्षिक उपलब्धि से अधिक है।यह फैसला समाज में बच्चों के प्रति होने वाले यौन अपराधों के खिलाफ एक सख्त संदेश देता है और यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे जघन्य अपराधों के लिए कोई भी अपराधी, चाहे वह नाबालिग ही क्यों न हो, कठोर सजा से बच नहीं पाएगा।
