यह मंत्र तीन हिंदी शब्दों, महा अर्थात महान, मृत्यु अर्थात मृत्यु और जय अर्थात विजय, का मिश्रण है। इसका अर्थ है मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला। हिंदू पौराणिक कथाओं में इसे मृत-संजीवनी मंत्र भी कहा जाता है। यह किसी को भी मृत्यु के चंगुल से वापस ला सकता है। इसकी रचना ऋषि मार्कंडेय ने की थी। इस मंत्र के जाप के बाद ही स्वयं भगवान शिव ने यमराज को आदेश दिया था कि वे उसे न ले जाएँ।
मंत्र जाप के नियम
इस मंत्र के जाप के कुछ नियम हैं। यह मंत्र तभी काम करता है जब भगवान शिव और इस मंत्र में आपकी आस्था हो, आपका ध्यान आपकी तीसरी आँख, जिसे आज्ञा चक्र कहते हैं, पर होना चाहिए।
तीसरी आँख और महामृत्युंजय का संबंध
तीसरी आँख हमें स्वयं ईश्वर को महसूस करने और उनसे जुड़े रहने की शक्ति देती है। हम जानते हैं कि अमरता संभव नहीं है, लेकिन भगवान शिव की कृपा से हमारी मृत्यु को कुछ हद तक टाला जा सकता है। इसलिए मंत्र जाप करते समय पूरा ध्यान भौहों के मध्य में होना चाहिए।
मंत्र जप का समय
याद रखें, इस मंत्र का जप पूरी श्रद्धा, विश्वास और ईमानदारी से करना चाहिए। इस मंत्र का जप सुबह, खासकर सुबह 4 से 4.30 बजे के बीच करना सबसे अच्छा माना जाता है। हो सके तो सुबह घर से निकलने से पहले, दवा लेने से पहले और सोने से पहले 9 बार जप करने की आदत डालें।
अनिवार्य मृत्यु के लिए?
जब डॉक्टर मरीज को ठीक न कर पाने की लाचारी जताते हैं, तब भी एक बात सामने आती है कि अब तो भगवान ही उन्हें बचा सकते हैं। यहीं पर महामृत्युंजय मंत्र अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। अगर किसी को मृत्यु जैसी पीड़ा हो या मृत्यु निकट प्रतीत हो रही हो, तो उसके लिए कम से कम 150000 बार महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। ध्यान रखने वाली बात यह है कि जप आध्यात्मिक रूप से मजबूत व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए जिसके पास महामृत्युंजय मंत्र हो और उसे पूरी श्रद्धा और नियम के साथ जप करना चाहिए। कई बार साधक की गलतियाँ मंत्र शक्ति के फल को निष्फल कर देती हैं। यदि संभव हो तो रोगी की पत्नी, पति, पुत्र, पुत्री अथवा माता-पिता में से कोई भी यह जप कर सकता है। कष्ट निवारण होने तक जप बंद नहीं करना चाहिए।
