पाकिस्तानी सेना की आंखों की किरकिरी बना बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) एक बार फिर चर्चा में है। लेकिन इस बार इस संगठन ने न तो कोई हमला किया है और न ही कोई घोषणा की है। दरअसल, अमेरिका ने बीएलए को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने इसकी पुष्टि की है। इसे बलूचिस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, इसलिए यह निश्चित रूप से पाकिस्तानी सेना प्रमुख की जीत है। बीएलए को आतंकवादी संगठन घोषित करने से उसका वैश्विक समर्थन कमज़ोर होगा, वहीं दूसरी ओर बलूचों पर पाकिस्तानी सेना के अत्याचार और बढ़ेंगे। आइए जानते हैं कि बलूचिस्तान या बलूच लिबरेशन आर्मी आखिर है क्या?
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ट्रेन हाईजैक कर दुनिया भर में सुर्खियाँ बटोरीं
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए ने इस साल मार्च में अंतरराष्ट्रीय सुर्खियाँ बटोरीं जब उसने क्वेटा से पेशावर जा रही ट्रेन जाफ़र एक्सप्रेस को हाईजैक कर लिया। इस ट्रेन को छुड़ाने के लिए पाकिस्तानी सेना को काफी पसीना बहाना पड़ा। लगभग 40 घंटे बाद पाकिस्तानी सेना इसे अपने कब्जे में ले पाई। पाकिस्तानी सेना और बीएलए, दोनों ने इस अभियान के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए, लेकिन इस हमले ने एक बात साफ़ कर दी कि अब यह समूह सिर्फ़ पहाड़ों में सक्रिय गुरिल्ला लड़ाके नहीं हैं, बल्कि उनके पास एक प्रशिक्षित सेना है, जो बेहद मज़बूत है।
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी की कहानी
बीएलए की कहानी 2000 के दशक की शुरुआत में बलूचिस्तान में शुरू हुए सशस्त्र आंदोलन से शुरू होती है। बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा, खनिज और संसाधनों से भरपूर, सबसे कम आबादी वाला और सबसे पिछड़ा प्रांत है। बलूच लोग इसके लिए पाकिस्तान सरकार की नीतियों को ज़िम्मेदार मानते हैं। 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद, इस क्षेत्र में कम से कम पाँच अलगाववादी विद्रोह हुए हैं। सबसे हालिया आंदोलन 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ था।
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नवाब बुगती की हत्या से बिगड़े हालात
बलूचिस्तान में हिंसा की स्थिति वर्ष 2006 में हुई एक हत्या के कारण और बिगड़ गई, जिसे पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने अंजाम दिया था। यह पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के आदेश पर बलूचिस्तान के सबसे प्रमुख कबायली नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या थी। अकबर बुगती न केवल प्रभावशाली बुगती समुदाय के मुखिया थे, बल्कि बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री भी थे। इस हत्या ने पाकिस्तान को झकझोर दिया, लेकिन इसका सबसे ज़्यादा असर बलूचिस्तान में महसूस किया गया।
बुगती की हत्या के बाद, बलूचियों की नई पीढ़ी को यह विश्वास हो गया कि पाकिस्तानी शासन उनके साथ बातचीत नहीं करना चाहता। इससे बलूचिस्तान में अलगाववाद की लहर दौड़ गई। इस समूह ने बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों, सरकारी बुनियादी ढाँचे और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुड़ी परियोजनाओं को निशाना बनाकर हिंसक हमले किए। इसकी विशेष इकाई मजीद ब्रिगेड आत्मघाती अभियानों और ज़्यादा समन्वित शहरी हमलों के लिए जानी जाती है। इस समूह के ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षित ठिकाने हैं, जिससे यह बलूचिस्तान के अंदर अपने हमले जारी रख सकता है। कुछ रिपोर्टों से पता चलता है कि इस समूह ने अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका द्वारा छोड़े गए हथियार हासिल कर लिए हैं और अपनी क्षमताओं को बढ़ाया है।
बीएलए का नया नेतृत्व
बीएलए की शुरुआत कबायली नेतृत्व में हुई थी, लेकिन असलम बलूच और बशीर ज़ेब जैसे कमांडरों के शामिल होने से इसे एक नया रूप मिला। असलम और ज़ेब बलूच छात्र संगठन आज़ाद के कैडर से निकले और बाद में बीएलए में शामिल हो गए। लंदन में बैठे हिर्बयार मर्री जैसे नेताओं से उनकी बनती नहीं थी और इस तरह धीरे-धीरे यह आंदोलन कबायली सरदारों के हाथों से निकलकर मध्यम वर्ग के विद्रोह में बदल गया। असलम बलूच ने शिक्षित बलूच युवाओं को समूह से जोड़ने पर ज़ोर दिया। इस बदलाव ने शरी बलूच, सुमैया कलंदरानी और महल बलूच जैसी महिलाओं को बीएलए की मजीद ब्रिगेड के लिए आत्मघाती हमलावरों के रूप में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया। बलूचिस्तान जैसे क्षेत्र में, सशस्त्र आंदोलन में महिलाओं का शामिल होना एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा गया।
इस समूह की क्या माँग है?
आंदोलन के समर्थकों का तर्क है कि पाकिस्तानी सरकार बलूचिस्तान की संपत्ति का शोषण करती है, जिससे स्थानीय आबादी गरीबी और राजनीतिक हाशिए पर जा रही है। हालाँकि बीएलए अपने संघर्ष को बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए एक स्वतंत्रता आंदोलन बताता है, लेकिन पाकिस्तान और कई पश्चिमी देश इसे हिंसा के इस्तेमाल के कारण एक आतंकवादी संगठन मानते हैं। बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं और नागरिक परिवहन पर इस समूह के हमलों ने वैश्विक स्तर पर इसकी स्थिति मज़बूत की है। यही कारण है कि अब अमेरिका इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक सीधा ख़तरा मानता है।
